हिंदू धर्म में पूजा-अर्चना के साथ परिक्रमा का भी बहुत महत्व है। शास्त्रानुसार परिक्रमा करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और पाप नष्ट होते हैं। इस विषय पर श्री महार्षि वेदव्यास वेद विद्यापीठ के प्रधानाचार्य आचार्य योगेशदत्त गौड ने बताया कि हमारे वेदों और शास्त्रों के अनुसार मंदिर या किसी भी धर्मिक स्थल के आस पास सकारात्मक ऊर्जा होती है इस बात को वैज्ञानिक भी माते हैं कि मंदिर में दिव्य शक्ति होने से हमें भी सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
जिससे मानसिक शांति और शारीरिक ऊर्जा का विकास होता है। मंदिर की परिक्रमा अपने दक्षिण भाग अर्थात दाएं हाथ से शुरू करनी चाहिए। दक्षिण की तरफ परिक्रमा करने से इसे ‘प्रदक्षिणा’ भी कहा जाता है। मंदिर में दैवीय शक्तियों का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर होता है। बाईं तरफ से परिक्रमा करने पर सकारात्मक ऊर्जा का हमारे अंदर विद्यामान ऊर्जा से टकराव होने पर हमारा तेज कम हो जाता है। परिक्रमा करते समय बीच-बीच में रुकना नहीं चाहिए और न ही किसी से बात करनी चाहिए। परिक्रमा नंगे पाव की जाती है। परिक्रमा लगाते हुए देवी-देवता के सामने पहुंचने पर उन्हें प्रणाम करना चाहिए। परिक्रमा अधूरी करने से पूर्ण फल नहीं मिलता।
वैदिक ज्योतिष आश्रम बरेली के आचार्य पंडित डॉ अभिनव भारद्वाज ने बताया कि परिक्रमा यदि भजन और मंत्र के साथ की जाए तो और प्रभावशाली होती है । मंत्र दोनों प्रकार के है वैदिक और लौकिक जिसका उच्चारण परिक्रमा के दौरान किया जाता है लौकिक मंत्र है –
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे-पदे।।
वेद मंत्र है -ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः।तेषां सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥
अथार्त: मेरे द्वारा जाने-अनजाने और पिछले जन्मों में किए सारे पाप इस परिक्रमा से समाप्त हो जाएं। परमात्मा मुझे अच्छे कार्य करने की बुद्धि प्रदान करें।

परिक्रमा या प्रदक्षिणा
परिक्रमा या संस्कृत में प्रदक्षिणा, प्रभु की उपासना करने के लिए की जाती है। अकसर लोग मंदिरों, मस्जिदों तथा गुरुद्वारों में एक विशेष स्थल जहां भगवान की मूरत या फिर कोई पूज्य वस्तु रखी जाती है, उस स्थान के आस-पास चक्राकार दिशा में परिक्रमा करते हैं। सनातन धर्म के महत्वपूर्ण वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद से हमें प्रदक्षिणा के बारे में जानकारी मिलती है।
यह भी पढ़ें:- भगवान राम को क्यों कहते हैं रामचन्द्र?
प्रदक्षिणा में छिपा इतिहास
यह परिक्रमा केवल पारंपरिक आधार पर ही नहीं की जाती बल्कि इसे करने के और भी कारण हैं। कारण जानने से पहले जरूरी है परिक्रमा करने के लाभ जानना लेकिन इससे भी अति आवश्यक है परिक्रमा करने के पीछे का इतिहास। हिन्दू धार्मिक इतिहास में दी गए एक कथा हमें परिक्रमा करने का कारण भी बताती है।
एक बार भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती द्वारा अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर उनके पास वापस लौटने का आदेश दिया गया। जो भी पुत्र इस परिक्रमा को पूर्ण कर माता के पास सबसे पहले पहुंचता वही इस दौड़ का विजेता होता तथा उनकी नजर में सर्वश्रेष्ठ कहलाता। यह सुन कार्तिकेय अपनी सुंदर सवारी मोर पर सवार हुए तथा पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े। उन्हें यह भ्रमण समाप्त करने में युग लग गए लेकिन दूसरी ओर गणेश द्वारा माता की आज्ञा को पूरा करने का तरीका काफी अलग था जिसे देख सभी हैरान रह गए। गणेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े तथा माता पार्वती के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं। बाद में प्रभु गणेश से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। इस पौराणिक कथा में भगवान गणेश की सूझबूझ ना केवल मनुष्य को परिक्रमा पूर्ण करने का महत्व समझाती है, बल्कि यह भी बताती है कि हमारे माता-पिता, जो कि ईश्वर के समान हैं उनकी परिक्रमा करने से ही हमें संसार का ज्ञान प्राप्त होता है।
इनकी भी होती है परिक्रमा
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार केवल भगवान ही नहीं बल्कि और भी कई वस्तुओं की परिक्रमा की जाती है। ईश्वर के अलावा अग्नि, पेड़ तथा पौधों की परिक्रमा भी की जाती है। सबसे पवित्र माने जाने वाले तुलसी के पौधे की परिक्रमा करना हिन्दू धर्म में काफी प्रसिद्ध है। इसके अलावा पीपल के पेड़ और अग्नि की परिक्रमा भी की जाती है।
अग्नि की परिक्रमा हिन्दू विवाह की एक अहम रीति है जिसमें भावी पति तथा पत्नी द्वारा विवाह संस्कार के दौरान एक-दूसरे से पावन रिश्ता जोड़ने के लिए हवन कुंड में जलती हुई अग्नि के वैदिक विधि में चार फेरे और लौकिक विधि में सात फेरे लिए जाते हैं। फेरों में पति तथा पत्नी द्वारा जीवन भर साथ निभाने के वचन भी लिए जाते हैं।
ऐसे करें परिक्रमा
किसी विशेष मंदिर में प्रभु के विग्रह की पूजा सामग्री के साथ आराधना करने के बाद भक्त वहां से बाहर आ जाता है। इसके बाद मंदिर के आसपास गोलाकार रूप में बनाई जगह का चक्कर लगाया जाता है। ध्यान रहे कि इस रास्ते में सामने की ओर देखते हुए घड़ी की सुई की दिशा में ही चलना होता है। यह परिक्रमा भक्तों द्वारा ध्यानपूर्वक भाव से की जाती है।
जल्दी ना करें
यह भी मान्यता है कि परिक्रमा हमेशा धीरे-धीरे ही करनी चाहिए और हमें किसी भी प्रकार की जल्दी नहीं करनी चाहिए। आराम से चलते हुए हमारा प्रभु पर ध्यान बना रहता है और इसी प्रकार हमें मन की शांति प्राप्त होती है। प्रदक्षिणा को घड़ी की सुई की दिशा में करने का एक कारण यह भी है कि इस तरह से चलते हुए प्रभु हमेशा हमारे दाईं ओर रहते हैं जिससे हमें खुद भी जीवन में सही दिशा में रहने की ही सीख मिलती है।
परिक्रमा करने के लाभ
भगवान से विभिन्न फल पाने के लिए या फिर अपने मन को शांति देने के लिए हम उनसे प्रार्थना करते हैं। इसी तरह से भगवान की परिक्रमा करते हुए भी हमें अनेक लाभ मिलते हैं। कहते हैं मंदिर या पूजा स्थल पर प्रार्थना करने के बाद उस जगह का वातावरण काफी सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
ऋग्वेद में प्रदक्षिणा
वैदिक व्याकरण और ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों (प्र + दक्षिणा) में विभाजित किया गया है। इस शब्द में उपस्थित प्र उपसर्ग से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा। यानी कि ऋग्वेद के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। इस परिक्रमा के दौरान प्रभु हमारे दाईं ओर गर्भ गृह में विराजमान होते हैं। लेकिन प्रदक्षिणा को दक्षिण दिशा में ही करने का नियम क्यों बनाया गया है?
दक्षिण दिशा जरूरी
मान्यता है कि परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है तभी हम दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़ते हैं। तो फिर क्या कारण है जो हमें घड़ी की सुई की दिशा में ही चलना चाहिए। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के आधार पर ईश्वर हमेशा मध्य में उपस्थित होते हैं। यह स्थान प्रभु के केंद्रित रहने का अनुभव प्रदान करता है।
प्रभु का मध्य स्थान
यह बीच का स्थान हमेशा एक ही रहता है और यदि हम इसी स्थान से गोलाकार दिशा में चलें तो हमारा और भगवान के बीच का अंतर एक ही रहता है। यह फासला ना बढ़ता है और ना ही घटता है। इससे मनुष्य को ईश्वर से दूर होने का भी आभास नहीं होता और उसमें यह भावना बनी रहती है कि प्रभु उसके आसपास ही हैं।
परिक्रमा का वैज्ञानिक लाभ
जो भी व्यक्ति उस स्थान पर उस समय मौजूद होता है उसे इस ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि ठीक गणेश भगवान की तरह ही मंदिर में भक्त भी भगवान की मूर्ति की परिक्रमा करता है और उनसे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है। यह ऊर्जा हमें जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। इस तरह ना केवल आध्यात्मिक वरन् मनुष्य के शरीर को भी वैज्ञानिक रूप से लाभ देती है परिक्रमा।
शास्त्रानुसार सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग है-
– श्री राम भक्त हनुमान की तीन परिक्रमा करनी चाहिए।
– भगवान शिव को चढ़ाया जल जिस ओर से निकलता हो उसे लांघ कर नहीं जाना चाहिए, वहीं से वापिस हो जाना चाहिए, इसलिए शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है।
– माता आदिशक्ति की एक या तीन परिक्रमा की जाती है।
– श्री कृष्ण की चार परिक्रमा करने से पुण्य प्राप्त होता हैै।
– सृष्टि के पालनहार विष्णु भगवान की चार परिक्रमा करना शुभ होता है।
– भगवान श्री राम की चार परिक्रमा होती हैं।
– प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की तीन परिक्रमा करने से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और कार्य सिद्ध होते हैं।
– भैरव भगवान की तीन परिक्रमा की जाती हैं।
– शनि भगवान की सात परिक्रमा करनी चाहिए।
– सूर्य भगवान ही एक ऐसे देवता हैं जो प्रत्यक्ष हैं। उनकी सात परिक्रमा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
– पीपल के वृक्ष में 33 कोटि (प्रकार) के देवी-देवताओं का वास होने से इसे बहुत पवित्र माना जाता है। शनिवार को इसकी सात बार परिक्रमा करने से शनि दोष व अन्य ग्रहों के दोष नष्ट होते हैं।
