बदायूं। देशभर में जहां रक्षाबंधन का त्योहार शुक्रवार, 28 अगस्त को मनाया जाएगा, वहीं बदायूं जिले के कादरचौक क्षेत्र के 14 गांवों में एक दिन पहले ही भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन मनाया गया। सदियों से चली आ रही भुजरियन परंपरा के तहत इन गांवों में बृहस्पतिवार को बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी और सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान गांवों में त्योहार को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला।
कादरचौक क्षेत्र के ये 14 गांव स्थानीय स्तर पर भंटेली के नाम से जाने जाते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, यहां रक्षाबंधन एक दिन पहले मनाने की परंपरा का संबंध महोबा के चंदेल शासन और वीर योद्धाओं आल्हा-ऊदल की वीरगाथाओं से जुड़ा हुआ है। हालांकि, इस परंपरा से जुड़ी कई बातें स्थानीय मान्यताओं और बुजुर्गों से चली आ रही मौखिक परंपरा पर आधारित हैं।
युद्ध के चलते एक दिन पहले मनाया गया था रक्षाबंधन
ग्रामीणों के अनुसार पुराने समय में इस क्षेत्र में जमींदारी व्यवस्था थी। स्थानीय जमींदार ठाकुर सोरन सिंह, वीरेंद्र सिंह और लाखन सिंह यादव महोबा के चंदेल शासक परमाल के अधीन बताए जाते हैं। लोकमान्यता है कि दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण किया था। उस समय रानी चंद्रबली ने अपने मुंहबोले भाई आल्हा से राज्य की रक्षा के लिए सहायता मांगी थी।
बताया जाता है कि युद्ध के लिए रक्षाबंधन का दिन तय हुआ था। ऐसे में आल्हा ने अपने अधीन माने जाने वाले 14 गांवों में एक दिन पहले ही राखी बंधवाने की घोषणा की, ताकि अगले दिन वह युद्ध के लिए रवाना हो सकें। इसी घटना को इन गांवों में रक्षाबंधन एक दिन पहले मनाने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
कुछ ग्रामीण इस परंपरा को तत्कालीन जमींदारी व्यवस्था के अत्याचार के खिलाफ हुए संघर्ष से भी जोड़ते हैं। समय बीतने के साथ युद्ध और तत्कालीन परिस्थितियां इतिहास का हिस्सा बन गईं, लेकिन त्योहार एक दिन पहले मनाने की परंपरा आज भी कायम है।
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इन गांवों में एक दिन पहले मनाया जाता है त्योहार
कादरचौक, लभारी, चौडेरा, मामूरगंज, गढ़िया, भोजपुर, कचौरा, देवी नगला, सिसौरा, गनेश नगला, कलुआ नगला, कैथोला, राजीव नगर और नारायण नगला में रक्षाबंधन एक दिन पहले मनाने की परंपरा है। ग्रामीणों के मुताबिक गंगा पार के करीब 12 गांवों में भी इसी तरह एक दिन पहले रक्षाबंधन मनाया जाता है।
त्योहार के मौके पर बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। परिवारों में पकवान बनाए जाते हैं और लोग एक-दूसरे को त्योहार की बधाई देते हैं। आधुनिक दौर में भी ग्रामीणों ने इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना रखा है।
पूर्वजों की गाथा से जुड़ी है परंपरा
कैथोला निवासी सेवाराम कश्यप के मुताबिक यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। रक्षाबंधन के बहाने ग्रामीण अपने पूर्वजों की गाथा और पुराने समय की घटनाओं को भी याद करते हैं। उनका कहना है कि यह रस्म चंदेल वंश तथा आल्हा-ऊदल की वीरगाथा से जुड़ी हुई मानी जाती है।
स्थानीय निवासी संजय मिश्रा ने बताया कि महोबा शासन के समय इस क्षेत्र के जमींदार आल्हा पक्ष के साथ बताए जाते हैं। युद्ध के लिए रवाना होने की वजह से एक दिन पहले रक्षाबंधन मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई। उन्होंने दावा किया कि आल्हा-ऊदल के इतिहास से संबंधित पुस्तक में भी इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
इतिहास और लोकपरंपरा का अनूठा मेल
बदायूं के इन गांवों में रक्षाबंधन का एक दिन पहले मनाया जाना आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय है। यहां त्योहार महज भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, लोकगाथाओं और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा भी है। यही वजह है कि ग्रामीण हर वर्ष इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।
