NCPI: ऊपर वाला जब भी देता देता छप्पर फाड़…, जाने जीरो से हीरो बनने की एनसीपीआई की पूरी कहानी

NCPI: ऊपर वाला जब भी देता देता छप्पर फाड़…, जाने जीरो से हीरो बनने की एनसीपीआई की पूरी कहानी

ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फाड़ कर देता है यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी लेकिन शायद ही किसी के पास इस कहावत का कोई प्रत्यक्ष उदाहरण हो। लेकिन यह कहावत एनसीपीआई के लिए एकदम सटीक साबित हो रही है। कुछ समय पहले तक जिसे कोई नहीं जानता था आज उस पार्टी की चर्चा पूरे देश हो रही है। चर्चा हो भी क्यों नहीं वर्तमान में यह पार्टी बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय पार्टी जो बन गई है। दरअसल टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का ऐलान कर दिया है और रातोंरात यह पार्टी बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय पार्टी बन गई है।

लोगों के मन में एक प्रश्न अवश्य होगा कि जिस पार्टी का नाम तक किसी ने नहीं सुना था इस पार्टी की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कुछ दिन पहले तक इस पार्टी के फेसबुक पेज पर मात्र 72 फॉलोअर्स थे, आखिर उस पार्टी ने ऐसा क्या कर दिया जो रातोंरात यह पार्टी बंगाल की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम सांसदों की सदस्यता बचाने की एक सोची-समझी कानूनी रणनीति है।

एनसीपीआई का इतिहास

एनसीपीआई का पूरा नाम है नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑ इंडिया। यह पार्टी मूल रूप से त्रिपुरा में रजिस्टर है। चुनाव आयोग के अनुसार यह एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है। कुल मिलाकर इस पार्टी को चुनाव आयोग की तरफ से कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। 2023 के पंचायत चुनावों में इस पार्टी ने बंगाल में दो उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। दोनों उम्मीदवार को कुल मिलाकर 822 वोट मिले थे। कुछ समय पूर्व तक इस पार्टी के फेसबुक पेज पर मात्र 72 फॉलोअर्स थे।

क्या बोले एनसीपीआई पार्टी के संस्थापक?

उत्तर 24 परगना जिले में रहने वाले संतनु डे ने खुद को एनसीपीआई के संस्थापक सदस्यों में से एक और पार्टी का राष्ट्रीय संगठन सचिव बताया। उन्होंने कहा कि यह हमारी पार्टी के लिए बढ़ने का मौका है। हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं और एनडीए के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहते हैं। अगर काकोली घोष दस्तीदार मुझे दिल्ली बुलाएं तो मैं जाऊंगा और हम साथ मिलकर प्रेस को संबोधित करेंगे।

कहां है एनसीपीआई का पार्टी दफ्तर?

कागजों के अनुसार एनसीपीआई का बंगाल में रजिस्टर्ड पता हावड़ा जिले के संकरैल इलाके में एक घर का पता है। यह प्रॉपर्टी उत्तिय कुंडू और उनकी पत्नी शेवली कुंडू के नाम पर है। पड़ोसियों के अनुसार करीब 8 साल पहले नदिया जिले से यह लोग यहां आकर बसा थे। पड़ोसियों के अनुसार इस प्रॉपर्टी से एक एनजीओ भी चलाया जाता है जो सेल्फ हेल्प ग्रुप्स की महिलाओं को ट्रेनिंग देता है।

जानकारी के अनुसार उत्तिय कुंडू एक बांग्ला अखबार के संपादक, गणित के शिक्षक, ऑडिटर, स्वास्थ्य सलाहकार और योग स्वयंसेवक’ हैं। वहीं शेवली कुंडू कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील और जमीन सर्वे में डिप्लोमाधारी बताई जा रही हैं।

क्या है एनसीपीआई पार्टी का दावा?

बागी 20 सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने की खबर के अगले ही सोमवार को पार्टी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली जिसमें लिखा कि 20 लोकसभा सीटों के साथ एनसीपीआई बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय ताकत बन गई है। इसके साथ ही पार्टी ने एक ग्राफिक भी शेयर किया जिसमें बंगाल की 42 लोकसभा सीटों का बंटवारा दिखाया गया था। इस हिसाब से अभी एनसीपीआई के पास 20 सीटें हैं, बीजेपी के पास 12, टीएमसी के पास 8 और कांग्रेस के पास 1 सीट है। पार्टी ने एक अलग पोस्ट में सभी 20 बागी सांसदों का स्वागत करते हुए कहा कि सांसदों का लंबा राजनीतिक अनुभव, जमीनी जुड़ाव और लोगों के प्रति प्रतिबद्धता पार्टी को मजबूत और समृद्ध बनाएगी।

एनसीपीआई में शामिल होना सोची-समझी कानूनी रणनीति

टीएमसी गुट के बागी सांसदों का एनसीपीआई में विलय करने का फैसला भले आम लोगों को अजीब लग रहा होगा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम सांसदों की सदस्यता बचाने की एक सोची-समझी कानूनी रणनीति है। इससे बागी सांसदों को संसद में अपनी सामूहिक ताकत बनाए रखने के लिए कानूनी सुरक्षा मिल जाएगी और साथ ही, बीजेपी को भी पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर किसी बड़े राजनीतिक विरोध का सामना किए बिना संसद में इन सांसदों का समर्थन हासिल हो जाएगा।

एनसीपीआई में ही क्यों शामिल हुए बागी सांसद

जानकारों के अनुसार बागी सांसदों की मूल योजना स्पष्ट है कि वे दो-तिहाई सांसदों के साथ टीएमसी संसदीय दल से अलग होना चाहते थे, ताकि संसद में अपना एक स्वतंत्र गुट बनाकर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को अपना समर्थन दे सकें।

हालांकि, संसद के कड़े नियमों और दल-बदल विरोधी कानून के कारण ऐसी व्यवस्था के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थी। इस गंभीर कानूनी अड़चन को देखते हुए बागियों ने रणनीति बदली और एनसीपीआई का रुख किया। क्योंकि यह अज्ञात दल उन्हें वह कानूनी मान्यता दे सकता था, जो एक स्वतंत्र गुट के रूप में उन्हें कभी नहीं मिल पाती।

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