भगवान राम को क्यों कहते हैं रामचन्द्र

भगवान राम को क्यों कहते हैं रामचन्द्र

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को हिन्दू धर्म के सबसे अधिक पूजे जाने वाले भगवानों में गिना जाता है। भगवान श्री राम का जन्म सूर्यवंशी कुल में हुआ था। भगवान श्री राम को हिन्दू धर्म में एक आदर्श पुत्र, आदर्श राजा और एक आदर्श पति के रूप में पूजा जाता हैं। परंतु एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब भगवान श्री राम का जन्म सूर्यवंश में हुआ था तो उनके नाम के साथ “चंद्र” शब्द क्यों जोड़ा गया? और उन्हें रामचंद्र क्यों कहा जाता है? इस लेख में हम इसी कारण के बारे में बताने की कोशिश करेंगे।

लोक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों में इसके कई कारण बताए गए हैं। लेकिन सबसे लोक प्रिय तर्क है कि “चंद्र” शब्द का संबंध केवल चंद्रमा से नहीं बल्कि उसकी विशेषताओं से है। चंद्रमा को सुंदरता, शीतलता और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। भगवान श्री राम का स्वभाव भी इन्हीं गुणों से भरा हुआ था।

श्री रामचन्द्र जी शांत, विनम्र, करुणामय और सभी के प्रति सम्मान का भाव रखने वाले थे। इसलिए उनकी तुलना चंद्रमा से की गई और उन्हें ‘रामचंद्र’ कहा जाने लगा। इसी कारण भक्त भगवान राम को केवल एक राजा के रूप में नहीं, बल्कि शांति, प्रेम और मर्यादा के प्रतीक रामचंद्र के रूप में स्मरण करते हैं।

सोलह कलाओं से परिपूर्ण है भगवान राम

भगवान श्री राम में सोलह वर्ष की आयु में ही सभी सोलह कलाओं का संपूर्ण विकास हो गया था। वहीं चन्द्रमा में भी सोलह कलाएं होती है। इस कारण से भी भगवान राम को रामचन्द्र कहा जाता है।

चन्द्रमा को दिया था वरदान

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब राम जी बाल रूप में थे, तब उन्होंने चंद्रमा को उदास देखा। सूर्यवंशी होने के कारण चंद्रमा ने कहा कि केवल सूर्य की महिमा ही गाई जाती है। तब भगवान राम ने उसे वरदान दिया कि उनका नाम हमेशा चंद्रमा (चन्द्र) के साथ ही लिया जाएगा।

रामचरितमानस के सुंदरकांड में चन्द्रमा को श्री राम का सेवक कहा है

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामलता आभास।।

अर्थ हनुमान जी भगवान राम से कहते हैं कि चंद्रमा आपका सबसे प्रिय दास है इसी लिए चन्द्रमा ने आपकी छवि को अपने हृदय में धारण कर लिया है। रामचरितमानस के इस प्रसंग को भी रामचंद्र नाम से जोड़ा जाता है। राम भक्तों का मानना है कि चंद्रमा और भगवान राम के बीच यह एक आध्यात्मिक संबंध है, जो उनके नाम को और अधिक विशेष बना देता है।

वाल्मीकि रामायण में भी श्री राम की तुलना चन्द्रमा से की गई है

वाल्मीकि रामायण में कई स्थानों पर भगवान श्री राम के व्यक्तित्व और रूप की तुलना चंद्रमा से की गई है। राम भक्तों का मानना है कि उनके मुखमंडल की आभा, उनकी वाणी और उनका शांत स्वभाव लोगों को चंद्रमा की शीतल रोशनी की याद दिलाता था। इसी कारण समय के साथ राम के नाम के साथ “चंद्र” जुड़ गया।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई ‘कवितावली’ (बालकाण्ड)

कबहूं ससि मागत आरि करैं, कबहूं प्रतिबिम्ब निहारि डरैं।

अर्थ बाल्यकाल में भगवान राम कभी राम चंद्रमा को मांगने की जिद करते हैं, तो कभी पानी में चन्द्रमा का प्रतिबिंब देखकर डर जाते हैं।

इस प्रकार रामचंद्र नाम केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि भगवान राम के सौम्य, शांत और उज्ज्वल व्यक्तित्व का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि राम भक्त आज भी श्रद्धा से उन्हें रामचंद्र कहकर बुलाते हैं। 

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